बॉलीवुड का ‘मस्कुलर’ राष्ट्रवाद: क्या फ़िल्मी पर्दे के पीछे छिप रहा है लोकतांत्रिक क्षरण?

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AI-edited Screengrab from the Trailer of Dhurandhar: The Revenge Bollywood Film
AI-edited Screengrab from the Trailer of Dhurandhar: The Revenge Bollywood Film

बॉलीवुड का ‘मस्कुलर’ राष्ट्रवाद: क्या फ़िल्मी पर्दे के पीछे छिप रहा है लोकतांत्रिक क्षरण?

जब फिल्में बार-बार आक्रामकता को देशभक्ति के एकमात्र वैध रूप के रूप में पेश करती हैं, तो वे केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि दर्शकों को सत्ता पर बिना सवाल किए भरोसा करना सिखाती हैं।

RMN News Entertainment Desk
New Delhi | March 8, 2026

नई दिल्ली: दशकों तक, हिंदी फिल्म उद्योग (बॉलीवुड) भारत की “सॉफ्ट पावर” के एक सांस्कृतिक राजदूत के रूप में जाना जाता था, जो दुनिया को एक जीवंत और बहुलवादी पहचान दिखाता था। हालांकि, हाल के वर्षों में लोकप्रिय संस्कृति का राज्य की विचारधारा के साथ एक व्यवस्थित संरेखण देखा गया है, जिसने इस परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल दिया है। अब सिनेमाई पर्दे पर मधुर रोमांस और पारिवारिक महाकाव्यों के बजाय धमाकों, जासूसी और एक विशेष प्रकार के “मस्कुलर” (आक्रामक) राष्ट्रवाद का बोलबाला है।

“नया हिंदुस्तान” और आक्रामक नैरेटिव: मीडिया समाजशास्त्रियों के अनुसार, बॉलीवुड अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि यह एक “मस्कुलर मेनिफेस्टो” (आक्रामक घोषणापत्र) बन गया है, जो “नया हिंदुस्तान” की छवि को पेश करने के लिए सिनेमाई तंत्र का उपयोग कर रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण आगामी फिल्म धुरंधर: द रिवेंज‘ (2026) है। यह फिल्म एक ऐसा नैतिक ब्रह्मांड बनाती है जहाँ भारतीय राज्य को एक अजेय और दंड देने वाली शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। फिल्म का चर्चित संवाद, “यह नया हिंदुस्तान है। यह घर में घुसेगा भी। और मारेगा भी,” इस नए दौर का प्रतीक बन गया है।

लोकतंत्र के लिए ‘स्मोकस्क्रीन’ का खतरा:स्मोकस्क्रीन 2026” नामक एक रिपोर्ट इस बात का विश्लेषण करती है कि कैसे निर्मित राष्ट्रवाद का उपयोग लोकतांत्रिक वैधता के भ्रम को बनाए रखने के लिए किया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, यह अति-राष्ट्रवादी सिनेमा “इंस्टीट्यूशनल कैप्चर” (संस्थागत नियंत्रण) और जवाबदेही जैसे गंभीर सवालों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए एक विजुअल डिस्ट्रैक्शन (दिखावटी भटकाव) का काम करता है। जब तमाशा (स्पेक्टेकल) जांच की जगह ले लेता है, तो दर्शक नागरिक के बजाय केवल दर्शक बनकर रह जाते हैं।

पाकिस्तान-केंद्रित कहानियों पर बढ़ती निर्भरता: वर्तमान में बॉलीवुड रचनात्मक रूप से पाकिस्तान-केंद्रित कहानियों पर निर्भर होता जा रहा है। इस सूची में लाहौर 1947, धुरंधर, इक्कीस, बॉर्डर 2 और बैटल ऑफ गलवान जैसी फिल्में शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जटिल बहुलवाद के बजाय यह उद्योग अब “सुरक्षित दांव” (safe bets) के रूप में सांप्रदायिकTemplates को दोहरा रहा है।

वैश्विक स्तर पर गिरती साख और प्रतिबंध: भले ही ये फिल्में घरेलू स्तर पर भारी कमाई कर रही हैं—जैसे कि ‘धुरंधर’ (2025) ने कथित तौर पर ₹1,300 करोड़ का कारोबार किया—लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुँच रहा है। विशेष रूप से खाड़ी देशों में इन फिल्मों का कड़ा विरोध हो रहा है। सांप्रदायिक संकेतों और आक्रामक सामग्री के कारण कई फिल्मों को बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में प्रतिबंधित कर दिया गया है।

त्योहारों का रणनीतिक उपयोग: इन फिल्मों की रिलीज का समय भी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। उदाहरण के लिए, लाहौर 1947 को स्वतंत्रता दिवस (13 अगस्त) के सप्ताह में रिलीज किया जा रहा है, जबकि धुरंधर: द रिवेंज को 19 मार्च, 2026 को रिलीज करने की योजना है, जो ईद और अन्य त्योहारों के आसपास का समय है। यह रणनीतिक समय भावनाओं के चरम पर होने का लाभ उठाकर नैरेटिव को और मजबूत करता है।

निष्कर्ष: जब फिल्में बार-बार आक्रामकता को देशभक्ति के एकमात्र वैध रूप के रूप में पेश करती हैं, तो वे केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि दर्शकों को सत्ता पर बिना सवाल किए भरोसा करना सिखाती हैं। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि जैसे-जैसे हम इस “नया हिंदुस्तान” के तमाशे को देखते हैं, हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम उस भारत के गायब होने के गवाह बन रहे हैं जो कभी अपनी विविधता के लिए जाना जाता था।

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Rakesh Raman

Rakesh Raman is a journalist and tech management expert.

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