
बड़ी पड़ताल: नरेंद्र मोदी के 12 साल — विकास की हकीकत या सिर्फ़ सरकारी प्रचार का एक भारी भ्रम?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 साल के निरंतर शासन के विश्लेषण से पता चलता है कि सरकारी विज्ञापनों के विपरीत, भारत का राष्ट्रीय कर्ज 3.6 गुना बढ़कर ₹197 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है और शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Net FDI) में 96.5% की ऐतिहासिक गिरावट आई है। आर्थिक संकट और लोकतांत्रिक संस्थाओं के व्यवस्थित क्षरण के बीच, देश की लगभग 60% आबादी आज भी सरकारी राशन पर निर्भर है, जो ‘विकसित भारत’ के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
विकास का दावा या आंकड़ों की बाजीगरी?
जून 2026 में, नरेंद्र मोदी ने भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में 12 साल पूरे कर लिए हैं। जहाँ सरकारी मीडिया और “मन की बात” जैसे मंच एक आत्मनिर्भर और “विकसित भारत” की तस्वीर पेश करते हैं, वहीं आर्थिक आंकड़ों और वैश्विक सूचकांकों का स्वतंत्र विश्लेषण एक गंभीर ढांचागत क्षति की ओर इशारा करता है।
कर्ज का जाल: ₹55 लाख करोड़ से ₹197 लाख करोड़ तक
मोदी सरकार के कार्यकाल की सबसे बड़ी चिंताजनक बात केंद्र सरकार के कर्ज में हुई अभूतपूर्व वृद्धि है। मार्च 2014 में जो राष्ट्रीय कर्ज लगभग ₹55 लाख crore था, वह 2026 तक बढ़कर ₹197 लाख करोड़ से अधिक हो गया है—यानी मात्र एक दशक में 3.6 गुना की वृद्धि। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति उस परिवार की तरह है जो केवल बाहरी दिखावे और मेगा-प्रोजेक्ट्स के लिए क्रेडिट कार्ड पर कर्ज ले रहा है, जिसे चुकाने का बोझ आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।
2014 के बाद से भारत का राष्ट्रीय कर्ज ₹55 लाख करोड़ से बढ़कर ₹197 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है—यह विकास है या आने वाली पीढ़ियों के लिए कर्ज का जाल?
विदेशी पूंजी का पलायन और आर्थिक मंदी
“मेक इन इंडिया” के दावों के बावजूद, विदेशी निवेशक भारत से अपनी पूंजी तेजी से निकाल रहे हैं। हालांकि सकल एफडीआई (Gross FDI) में मामूली वृद्धि दिखाई देती है, लेकिन दीर्घकालिक निवेशक आईपीओ (IPO) के माध्यम से अपना पैसा देश से बाहर ले जा रहे हैं। वित्त वर्ष 2025 में $51.5 बिलियन की पूंजी देश से बाहर गई, जिसके परिणामस्वरूप नेट एफडीआई (Net FDI) घटकर केवल $353 मिलियन रह गया है—जो कि 96.5% की भारी गिरावट है।
नेट एफडीआई में 96.5% की गिरावट यह साबित करती है कि वैश्विक निवेशक अब भारत की आर्थिक नीतियों पर भरोसा खो रहे हैं और अपनी पूंजी बाहर निकाल रहे हैं।
‘मुफ्त राशन’ और गरीबी की वास्तविकता
सरकार 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त राशन देने को अपनी बड़ी सफलता बताती है। लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ यह है कि 12 साल के शासन के बाद भी, भारत की लगभग 60% जनसंख्या इतनी गरीब है कि वे अपने दम पर दो वक्त का भोजन भी नहीं जुटा सकते। यह स्थिति ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ में भारत की खराब रैंकिंग (123 देशों में 102वां स्थान) और युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी व आत्महत्या की घटनाओं से और भी पुख्ता होती है।
संस्थागत कब्जा और ‘चुनावी तानाशाही’
आर्थिक गिरावट के साथ-साथ, भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। कई अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों (जैसे V-Dem) ने अब भारत को एक “चुनावी तानाशाही” (electoral autocracy) के रूप में वर्गीकृत किया है। केंद्रीय एजेंसियों (ED, CBI, Income Tax) का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने और प्रेस की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए किए जाने के आरोप लगातार लग रहे हैं।
सुधार की राह: 50 साल का अनुमान
इन 12 वर्षों में हुई ढांचागत क्षति—चाहे वह सार्वजनिक कर्ज हो, संस्थागत स्वतंत्रता का विनाश हो या क्रोनी कैपिटलिज्म (पूंजीपति मित्रों को लाभ पहुँचाना)—को ठीक करना आसान नहीं होगा। आर्थिक विश्लेषकों का अनुमान है कि भारत को अपनी लोकतांत्रिक सेहत और आर्थिक स्थिरता वापस पाने में कम से कम 50 साल लग सकते हैं।
This article is part of our ongoing research on Narendra Modi under the title: “Narendra Modi: Twelve Years of Misrule and the Illusion of Growth?“
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