
सलमान खान का मोदी शासन से विद्रोह: भारत में जारी छात्र आंदोलनों का समर्थन
सड़कों पर पुलिसिया बर्बरता और पेपर लीक के जानलेवा संकट से जूझ रहे गुमनाम छात्रों के पक्ष में खड़े होकर, सलमान खान ने मोदी शासन के दशकों पुराने सांस्कृतिक नियंत्रण के तिलिस्म को तोड़ दिया है। जुलाई 2026 का यह घटनाक्रम न केवल एक व्यक्तिगत बयान है, बल्कि यह उस संस्थागत सड़न (institutional decay) को उजागर करता है जिसने भारतीय सिनेमा को राज्य के एक प्रोपेगेंडा हथियार में तब्दील कर दिया था। जब व्यवस्था का सबसे बड़ा ‘नैरेटिव ड्राइवर’ ही विद्रोह कर दे, तो यह एक तानाशाही तालमेल की विफलता का स्पष्ट प्रमाण है।
By Rakesh Raman
New Delhi | July 23, 2026
1. प्रस्तावना: एकाश्म व्यवस्था में पहली बड़ी दरार
किसी भी निरंकुश राजनैतिक परिदृश्य में, सांस्कृतिक नायकों का राज्य की विचारधारा के साथ पूर्ण आत्मसमर्पण उनके अस्तित्व की पहली शर्त होती है। वर्ष 2026 के भारत में बॉलीवुड अब केवल मनोरंजन का केंद्र नहीं है; इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन के तहत एक ‘ग्लीशालटुंग’ (Gleichschaltung) प्रोजेक्ट के रूप में पुनर्गठित किया गया है। यह शब्द 1940 के दशक के नाजी जर्मनी के ‘यूफा’ (Ufi) ब्लूप्रिंट की याद दिलाता है, जिसका उद्देश्य मीडिया, कला और समाज के हर हिस्से का ‘पूर्ण राज्य-प्रबंधित समन्वय’ करना था। यह केवल प्रभाव नहीं, बल्कि एक ऐसा दमघोंटू शिकंजा है जहां हर कहानी और हर नायक को राज्य के विमर्श के अनुसार ही ढलना पड़ता है।
सलमान खान लंबे समय से इस ‘वेपनाइज्ड एंटरटेनमेंट‘ (हथियारबंद मनोरंजन) के प्रमुख चेहरा रहे हैं। लेकिन जुलाई 2026 में, इस अभेद्य दिखने वाली एकाश्म व्यवस्था (monolith) में एक गहरी वैचारिक दरार दिखाई दी है। देश की शिक्षा व्यवस्था में फैली सड़न और प्रशासनिक अक्षमता से उपजे छात्र असंतोष ने एक ऐसा मोड़ ला दिया है, जहां प्रोपेगेंडा की मशीनरी और सड़कों की कड़वी हकीकत के बीच सीधा टकराव अब अपरिहार्य हो गया है।
2. डिजिटल विद्रोह: सलमान खान का रणनीतिक बयान
अत्यधिक डिजिटल निगरानी के इस दौर में सोशल मीडिया केवल एक मंच नहीं, बल्कि नपे-तुले राजनैतिक संदेशों का युद्धक्षेत्र है। 22 जुलाई को सलमान खान ने इस ‘डिजिटल ओमेर्टा’ (मौन की शपथ) को तोड़ते हुए एक ऐसा बयान जारी किया जिसने सत्ता के गलियारों में भूकंप ला दिया। अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म से खान ने संघर्षरत छात्रों के शांतिपूर्ण ‘आंदोलन’ का खुलकर समर्थन किया और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई पुलिसिया हिंसा पर गहरा शोक व्यक्त किया।
विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें तो खान द्वारा इस संकट को “विन-विन” स्थिति के रूप में पेश करना राजनैतिक उत्तरजीविता (survival) की एक मास्टरक्लास है। एक तरफ “सड़े हुए सिस्टम” की आलोचना कर उन्होंने आक्रोशित युवाओं के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाया, वहीं दूसरी ओर “सरकार समर्थन करेगी” जैसे शब्दों का प्रयोग कर शासन को एक ‘फेस-सेविंग’ एग्जिट रूट भी दिया।
[ 🔊 सलमान खान द्वारा भारत में जारी छात्र आंदोलनों का समर्थन: ऑडियो विश्लेषण ]
हालांकि, ऐसी व्यवस्था में जहां 99% वफादारी को भी 100% बगावत माना जाता है, खान का यह कदम Retribution (प्रतिशोध) के भारी जोखिम से भरा है। यह एक चतुर सामरिक पैंतरेबाज़ी है, जो यह संकेत देती है कि राज्य का सबसे भरोसेमंद मोहरा अब अपनी ब्रांड वैल्यू और अंतरात्मा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
3. ज़मीनी हकीकत: शिक्षा संकट और राज्य का दमन
जब प्रशासनिक विफलताएं असहनीय हो जाती हैं, तो राज्य के गढ़े हुए काल्पनिक नैरेटिव ढहने लगते हैं। वर्तमान भारत ‘पेपर लीक’ के उस भयावह संकट से जूझ रहा है जिसने लाखों गुमनाम युवाओं के भविष्य को कुचल दिया है। इसी हताशा ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी‘ (CJP) जैसे छात्र समूहों को जन्म दिया है। ‘कॉकरोच’ नाम का चयन अत्यंत प्रतीकात्मक और तीखा है—यह उन ‘नगण्य’ नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें सत्ता अपने जूतों तले कुचल तो सकती है, लेकिन उनकी उत्तरजीविता (resilience) को समाप्त नहीं कर सकती।
20 जुलाई को जंतर-मंतर पर इन छात्रों के साथ जो हुआ, उसने राज्य के असली चरित्र को नंगा कर दिया। दिल्ली पुलिस ने—जो सीधे केंद्र के अधीन है—शांतिपूर्ण मार्च निकाल रहे छात्रों पर लाठियां बरसाईं और आंसू गैस के गोले छोड़े। महिला प्रदर्शनकारियों के साथ की गई बदसलूकी ने स्पष्ट कर दिया कि शासन संवाद के बजाय केवल शारीरिक बल (brute force) की भाषा समझता है। यहाँ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान केवल एक ‘डिस्पोजेबल शील्ड’ (फेंकने योग्य ढाल) की तरह इस्तेमाल किए जा रहे हैं, ताकि संस्थागत सड़न की आंच सीधे शीर्ष नेतृत्व तक न पहुंचे।
4. ‘मातृभूमि’ का धुंआ: मनोरंजन का हथियारकरण
जब सड़कों पर विमर्श हारने लगता है, तो शासन सिनेमाई पर्दे के पीछे शरण लेता है। ‘ग्लीशालटुंग’ प्रोजेक्ट की असली ताकत राष्ट्रीय आघातों को फिल्म के माध्यम से ‘सैनिटाइज’ करने में निहित है। इसका सबसे सटीक उदाहरण आगामी वॉर-ड्रामा बैटल ऑफ गलवान का नाम बदलकर मातृभूमि: मे वॉर रेस्ट इन पीस करना है।
यह केवल एक फिल्म का नाम बदलना नहीं, बल्कि एक ‘रणनीतिक धुंध’ (tactical smokescreen) पैदा करना है। ‘गलवान’ शब्द सुनते ही उन 20 भारतीय सैनिकों की शहादत और सामरिक विफलताओं के सवाल कौंधते हैं। लेकिन जैसे ही उसे ‘मातृभूमि’ जैसे पवित्र और भावनात्मक शब्द से बदला जाता है, नागरिकों की आलोचनात्मक सोच को निष्क्रिय कर दिया जाता है। यह मनोरंजन का वह भयावह हथियारकरण है, जहाँ विशिष्ट सैन्य पराजयों को सामान्य देशभक्ति के आवरण में लपेटकर जवाबदेही से बचा जाता है। यह सिनेमा के जरिए जनता के मनोविज्ञान को ‘हैक’ करने की एक सोची-समझी कोशिश है।
5. राजनीतिक शून्य: अवसरवादिता बनाम वास्तविक संघर्ष
छात्रों का यह वास्तविक आंदोलन आज एक तरफ राज्य के दमन और दूसरी तरफ ‘राजनैतिक कचरे’ (clutter) के बीच फंसा हुआ है। सोनम वांगचुक जैसे पेशेवर प्रदर्शनकारी और सेवानिवृत्त कलाकार इस संघर्ष में केवल अपनी लुप्त होती प्रासंगिकता ढूंढ रहे हैं। वहीं, मुख्य विपक्षी दल का रवैया “गरजने वाले बादल, बरसते नहीं” (all bark, no bite) वाला रहा है।
21 जुलाई को राहुल गांधी का प्रधानमंत्री आवास के सामने किया गया संक्षिप्त शक्ति-प्रदर्शन और दबाव बढ़ते ही उनकी त्वरित वापसी ने विपक्ष की दिशाहीनता और सत्ता के प्रति व्याप्त खौफ को उजागर कर दिया। स्थापित विपक्ष की इस कायरता ने एक ऐसा शून्य पैदा किया है, जहां सलमान खान जैसे सितारे—जो खुद कभी इस मशीनरी के पुरजे थे—आज छात्रों की एकमात्र ‘नैतिक आवाज’ बनकर उभर रहे हैं। यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना है कि जहां राजनेताओं को खड़ा होना चाहिए था, वहां एक फिल्म स्टार व्यवस्था की सड़न पर सवाल उठा रहा है।
6. निष्कर्ष: क्या यह बदलाव की शुरुआत है?
सलमान खान का यह विद्रोह क्या किसी स्थायी स्वतंत्रता का उदय है या केवल राज्य-प्रबंधित समन्वय में एक क्षणिक व्यवधान? इसका उत्तर आने वाला समय देगा। लेकिन यह निर्विवाद है कि जब शासन के अपने सबसे बड़े ‘नैरेटिव ड्राइवर’ पुलिसिया बर्बरता और प्रणालीगत विफलता के बारे में सच बोलने लगते हैं, तो वह एकाश्म व्यवस्था अब उतनी सुरक्षित नहीं रह जाती। ‘ग्लीशालटुंग’ प्रोजेक्ट की बुनियाद ही पूर्ण वफादारी पर टिकी होती है, और खान का यह डिजिटल हमला उस पूर्ण नियंत्रण में एक ऐसी सेंध है जिसे भरना अब नामुमकिन हो सकता है। जब सत्ता के मोहरे ही सड़कों पर पिट रहे युवाओं की भाषा बोलने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि नैरेटिव का किला अंदर से ढह रहा है।
By Rakesh Raman, who is a national award-winning journalist and social activist. He is the founder of a humanitarian organization RMN Foundation which is working in diverse areas to help the disadvantaged and distressed people in the society.
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